वाचन संस्कृती

अनूपकुमार पुरोहित
धामनगांव रेलवे

ई लर्निंग के युग मे युवाओं को वाचन संस्कृति के प्रती जागरूक कराना अत्याधिक महत्वपूर्ण है किंतू राजकीय तथा प्रशासनिक अनस्था के चलते आज का युवा हमारी प्राचीन वाचन संस्कृति से अनभिज्ञ है. पुस्तकालयो के माध्यम से पाठकों के आवश्यकतानुसार पठनसामग्री का संकलन किया जाता है. जो लोग स्कूलों या कालेजों में नहीं पढ़ते, जो साधारण पढ़े लिखे हैं, अपना निजी व्यवसाय करते हैं अथवा जिनकी पढ़ने की अभिलाषा है और पुस्तकें नहीं खरीद सकते तथा अपनी रुचि का साहित्य पढ़ना चाहते हैं, ऐसे वर्गों की रुचि को ध्यान में रखकर जनसाधारण की पुस्तकों की माँग सार्वजनिक पुस्तकालय ही पूरी कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त प्रदर्शनी, वादविवाद, शिक्षाप्रद चलचित्र प्रदर्शन, महत्वपूर्ण विषयों पर भाषण आदि का भी प्रबंध भी सार्वजनिक पुस्तकालयो के माध्यम से पूर्व मे होता रहा हैं किंतू हाल फिलहाल के वर्षो मे पुस्तकालयों के प्रती अनास्थ बढ़ी है. वास्तव में लोक पुस्तकालय जनता के विश्वविद्यालय हैं, जो बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक नागरिक के उपयोग के लिए खुले रहते है और साक्षरता का प्रसार करते है.


राज्य सरकार द्वारा हर ग्राम जन पुस्तकालय योजना शुरु की गई थी जिसके तहत कई ग्रामीण क्षेत्रों मे तेजी से पुस्तकालय स्थापित किए गए किंतू सन 2013 मे अचानक ही पुस्तकालय योजना को राज्य सरकार द्वारा निरस्त कर दिया गया. जिसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों मे नए पुस्तकालयों की स्थापना प्राभावित हुई है.

मोबाइल, लैपटॉप के माध्यम से डिजिटल लर्निंग की बात जोर शोर से प्रचारित की जाती है किंतू यह सत्य से परे है. अब भी कई ग्रामीण क्षेत्रों मे पर्याप्त सुविधाओ के अभाव मे डिजिटल लर्निंग महज ढकोसला साबित होता नजर आता है.

प्रतिक्रिया-
मोबाइल के इस आधुनिक युग में पुस्तकलय के प्रती जागरूकता मुहिम समय की मांग है. युवा पीढ़ी मोबाइल के माध्यम से ज्यादातर अनर्गल कार्यों में समय व्यतीत कर रहि है. किताबो के माध्यम से ज्ञानार्जन को प्राथमिकता से प्रचारित किया जाना आवश्यक है. सरकारि नीतियां तथा यंत्रणा के इतर सामाजिक संगठन, स्कूल, कॉलेज द्वारा समुचित प्रयास आवश्यक है. वाचन संस्कृति समग्र सामाजिक विकास के मूल सिद्धांतों मे महत्वपूर्ण हिस्सा है. (प्राचार्य योगेंद्र गांडोळे, आदर्श महाविद्यालय)